अब डॉक्टरों की उलझी हुई लिखावट का दौर खत्म होने वाला है। राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग ने नया फरमान जारी कर प्रिस्क्रिप्शन में दवाओं के नाम साफ-सुथरे और पढ़ने लायक लिखना जरूरी कर दिया है। गलत या धुंधली पर्ची मिलने पर क्लिनिक और अस्पतालों को कड़ी कार्रवाई झेलनी पड़ सकती है।

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पर्ची की गड़बड़ी से क्यों खतरा?
डॉक्टरों की तेज लिखाई से अक्सर मरीजों को गलत दवा थम जाती है, जो छोटी चूक जानलेवा बन सकती है। कई बार केमिस्ट भी दवा पहचानने में भटकते हैं, जिससे इलाज बिगड़ जाता है। यह समस्या इतनी पुरानी है कि अब इसे संवैधानिक स्वास्थ्य अधिकार से जोड़ा जा रहा है। मरीज को पता होना चाहिए कि उसे कौन सी दवा दी जा रही है।
NMC ने क्या निर्देश दिए?
हर मेडिकल कॉलेज में दवाओं और चिकित्सा समिति के तहत एक खास उप-समिति बनेगी। यह टीम प्रिस्क्रिप्शन चेक करेगी, गलतियां ढूंढेगी और सुधार के उपाय बताएगी। डॉक्टरों को दवाओं के जेनेरिक नाम बड़े अक्षरों में लिखने का आदेश है। मेडिकल पढ़ाई में साफ लिखावट की ट्रेनिंग को शामिल किया जाएगा।
निगरानी कैसे होगी सख्त?
- समिति हर महीने पर्चियों की जांच करेगी और रिपोर्ट बनाएगी।
- अस्पष्ट लिखाई पकड़े जाने पर डॉक्टर को चेतावनी और क्लिनिक को जुर्माना लगेगा।
- बड़े अस्पतालों जैसे AIIMS में भी यह नियम लागू होगा, रिपोर्ट आयोग को भेजनी पड़ेगी।
मरीजों को क्या फायदा?
अब पर्ची घर लाकर खुद पढ़ सकेंगे, बिना केमिस्ट पर निर्भर हुए। गलत दवा का खतरा कम होगा, इलाज सही दिशा में चलेगा। भविष्य में डिजिटल पर्ची को बढ़ावा मिलेगा, लेकिन तब तक हाथ की लिखाई परफेक्ट रहेगी। यह कदम मरीजों की जान बचाने का बड़ा प्रयास है।
डॉक्टरों पर दबाव क्यों बढ़ा?
पहले से कई नियम थे जो साफ लिखावट की बात करते थे, लेकिन अमल नहीं हुआ। अब कोर्ट के दबाव में आयोग सक्रिय हो गया। मेडिकल संस्थानों को तुरंत समिति बनानी होगी, वरना सजा का डर है। छात्रों को बचपन से ही साफ लिखना सिखाया जाएगा।
आगे की राह क्या?
डिजिटल हेल्थ का जमाना आ चुका है, कंप्यूटर से प्रिंट पर्ची सामान्य बननी चाहिए। तब तक साफ हाथ की लिखाई ही एकमात्र विकल्प है। यह बदलाव स्वास्थ्य सेवा को मजबूत बनाएगा। मरीजों का भरोसा बढ़ेगा और चिकित्सा लापरवाही रुकेगी। कुल मिलाकर, छोटी सी साफ-सुथरी आदत बड़ी मुसीबतें टाल सकती है।
















