भारत की आर्थिक सुरक्षा और राजनीतिक घटनाक्रमों पर हमेशा से वैश्विक नजर रही है। स्वतंत्रता के बाद से लेकर 2016 में हुई नोटबंदी तक कई ऐसे मोड़ आए, जिन्होंने देश की दिशा और दशा दोनों को प्रभावित किया। यह रिपोर्ट कुछ ऐसी कड़ियों को जोड़ने की कोशिश करती है जो देश की आर्थिक चुनौतियों, कॉरपोरेट घोटालों और राजनीतिक फैसलों की जड़ तक जाती हैं।

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1991: जब भारत बेचने पड़ा था सोना
1991 के आर्थिक संकट में भारत को स्वर्ण भंडार गिरवी रखना पड़ा, क्योंकि सात दिनों का तेल आयात करने लायक विदेशी मुद्रा नहीं बची थी। वीपी सिंह सरकार में वाणिज्य मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी थे। पाकिस्तान को लेकर दावा किया गया कि विभाजन के बाद उसकी प्रगति भारत को कमजोर करने के एजेंडे पर आधारित रही।
प्रमुख घोटाले व कनेक्शन
- अब्दुल करीम तेलगी स्टांप पेपर स्कैम (1980-2006): सऊदी अरब से लौटे तेलगी ने नासिक प्रेस की पुरानी मशीनों से फर्जी स्टांप पेपर बनाए, जिससे अरबों का नुकसान हुआ। 2006 में गिरफ्तारी, 2007 में 30 साल की सजा।
- हर्षद मेहता स्कैम (1992): शेयर बाजार में हेराफेरी ने अर्थव्यवस्था हिलाई।
- 1993 मुंबई ब्लास्ट: दाऊद गिरोह से जुड़े, जब भारत आर्थिक तंगी में था।
IC-814 हाईजैक व सुरक्षा खामियां
1999 में IC-814 हाईजैक के दौरान इमोशनल प्रेशर से मसूद अजहर समेत आतंकियों की रिहाई हुई। नेगोशिएटर अजीत डोभाल थे, जबकि IB जॉइंट डायरेक्टर एएस दौलत। पैसेंजर लिस्ट में नोट पेपर सप्लायर का कनेक्शन बताया गया। अटल सरकार ने कथिततः एक कंपनी को नोट पेपर के लिए ब्लैकलिस्ट किया।
यूपीए सरकार और कथित करेंसी कॉन्ट्रैक्ट विवाद
2004 में यूपीए सरकार आते ही ब्रिटिश कंपनी De La Rue को नोटों के सिक्योरिटी थ्रेड और पेपर सप्लाई का कॉन्ट्रैक्ट मिला। बाद में आईबी की एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि यह कंपनी वही मेटेरियल पाकिस्तान को भी सप्लाई कर रही थी।
2010 में तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने का आदेश दिया। कहा जाता है कि 2012 में पी. चिदंबरम फिर से वित्त मंत्री बने तो इस कंपनी को दोबारा अनुबंध मिल गया।
पाकिस्तान का उद्देश्य: भारत की अर्थव्यवस्था पर वार
कई बार आईएसआई के अधिकारियों के बयान सामने आए हैं जिनमें भारत की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने की नीयत दिखाई दी। फेक करेंसी रैकेट भारत में नकली नोटों के माध्यम से फैलाया गया – जिसमें मालदा (बंगाल), राजस्थान, कश्मीर और दक्षिण राज्यों के रास्ते नकली नोट लाए जाने की खबरें प्रमुख थीं।
नोटबंदी: आर्थिक हमला या आर्थिक सुरक्षा?
8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 और 1000 रुपये के नोट बंद करने की घोषणा की। विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम नकली करेंसी नेटवर्क को खत्म करने और आतंक वित्त पोषण को रोकने की दिशा में निर्णायक था।
नोटबंदी के बाद भारत में डिजिटल लेनदेन में जबरदस्त उछाल आया और यूपीआई ने पूरी अर्थव्यवस्था को एक नए डिजिटल युग में प्रवेश दिलाया।
नकली करेंसी के खिलाफ भारत में अभी भी छोटे स्तर पर साजिशें जारी हैं, लेकिन डिजिटल भुगतान प्रणाली ने इसकी शक्ति को काफी हद तक सीमित कर दिया है। यूपीआई, ई-रूपी और डिजिटल ट्रांजैक्शन की नीति ने अर्थव्यवस्था को पारदर्शी, सुरक्षित और टैक्स आधारित बनाया है।
डिसक्लेमर:यह लेख गौरव प्रधान के पॉडकास्ट से प्रेरित जानकारी पर आधारित है, जहां वे भारत की आर्थिक चुनौतियों, राजनीतिक घोटालों और नोटबंदी को जोड़ते हुए एक नैरेटिव पेश करते हैं। गौरव प्रधान वैश्विक आईटी पेशेवर, डेटा वैज्ञानिक और डिजिटल रणनीतिकार हैं
















