बेंगलुरु की एक ब्रांच से शुरू हुआ मामला अब पूरे बैंक की प्रायोरिटी बैंकिंग यूनिट को हिला रहा है। अमीर ग्राहकों के खातों से अरबों रुपये का फंड गायब होने की खबरें सामने आ रही हैं। एक साधारण शिकायत ने ऐसा तूफान खड़ा कर दिया कि जांच का दायरा तेजी से बढ़ रहा है।

Table of Contents
शिकायत से घोटाले का पर्दाफाश
पिछले महीने एक ग्राहक ने बैंक की एमजी रोड शाखा में अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट से 2.7 करोड़ रुपये गायब होने की बात कही। शुरुआत में इसे छोटी अनियमितता समझा गया, लेकिन गहराई में उतरते ही भयानक सच्चाई सामने आई। सूत्र बताते हैं कि कुल 80 करोड़ रुपये से ज्यादा के फंड का हेरफेर हुआ, जिसमें कई हाई-प्रोफाइल कारोबारी परिवार शामिल हैं। ये ग्राहक बैंक की सबसे खास प्रायोरिटी लिस्ट में थे, जहां बड़े निवेश और वेल्थ मैनेजमेंट सर्विसेज मिलती हैं।
बैंक की आंतरिक कार्रवाई
बैंक ने फौरन मोर्चा संभाला। प्रारंभिक जांच में एक रिलेशनशिप मैनेजर का हाथ पकड़ा गया, जिसे तुरंत बर्खास्त कर दिया गया। पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया। बैंक ने बयान जारी कर कहा कि ग्राहकों का भरोसा उनकी प्राथमिकता है और जीरो टॉलरेंस पॉलिसी के तहत कार्रवाई की गई। प्रभावित लोगों से सीधे संपर्क कर नुकसान की भरपाई का वादा किया गया है। बाहर से हायर किए गए विशेषज्ञ अब हर कोने की तहकीकात कर रहे हैं।
पुलिस और कोर्ट की भूमिका
कर्नाटक सरकार ने मामले को सीआईडी को सौंप दिया, क्योंकि रकम 5 करोड़ से ऊपर होने से यह बड़ा अपराध बन गया। आरोपी नक्का किशोर कुमार पर फर्जी हस्ताक्षर और आरटीजीएस के जरिए फंड डायवर्ट करने का इल्जाम है। यह तरीका पुराने बैंकिंग घोटालों से मिलता-जुलता लग रहा है, जहां कर्मचारी ग्राहकों के पैसे अपने स्वार्थ के लिए उड़ा लेते थे। अदालत ने सख्ती दिखाते हुए हिरासत बढ़ा दी।
घोटाले का modus operandi
जांच में सामने आया कि मैनेजर ने फिक्स्ड डिपॉजिट के नाम पर फंड शिफ्ट किए। नकली दस्तावेज बनाकर पैसे बाहर भेजे गए, बिना ग्राहकों को भनक लगे। प्रायोरिटी यूनिट में ऐसे हाई-वैल्यू अकाउंट्स ज्यादा होते हैं, जो ठगों के लिए आसान शिकार बन जाते हैं। बैंकिंग सिस्टम में ऐसे छेद लंबे समय से चर्चा में हैं, लेकिन इस बार अमीर वर्ग प्रभावित होने से हड़कंप मच गया।
ग्राहकों के लिए सबक
यह घटना सभी को सतर्क करती है। नियमित स्टेटमेंट चेक करें, अनजान ट्रांजेक्शन पर सवाल उठाएं। बैंक भले भरपाई का वादा करें, लेकिन भरोसा टूटने का दर्द अलग होता है। प्रायोरिटी बैंकिंग चुनते समय कर्मचारियों की पृष्ठभूमि जांचें। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट से और राज खुल सकते हैं। कुल मिलाकर, बैंकिंग में सावधानी ही सबसे बड़ा हथियार है।
















