वंदे भारत ट्रेनें देश की रेल यात्रा का नया चेहरा बन चुकी हैं। तेज रफ्तार, आरामदायक सीटें और आधुनिक सुविधाओं से लैस ये ट्रेनें लाखों यात्रियों को आकर्षित करती हैं। लेकिन सवाल उठता है कि इनका वास्तविक स्वामित्व किसके पास है और रेलवे इन्हें कैसे चलाती है।

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निर्माण से लेकर मालिकाना हक तक
ये ट्रेनें चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्ट्री में मेक इन इंडिया अभियान के तहत तैयार होती हैं। हालांकि, इनका कानूनी मालिक भारतीय रेलवे नहीं बल्कि इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉर्पोरेशन (IRFC) होता है। IRFC एक सरकारी कंपनी है जो 1986 से रेलवे की वित्तीय जरूरतें पूरी करती आ रही है। यह बाजार से बॉन्ड्स के जरिए फंड जुटाती है और ट्रेन सेट खरीदकर रेलवे को लंबी अवधि के लिए सौंप देती है।
रेंटल सिस्टम की सच्चाई
रेलवे इन ट्रेनों को 30 साल की लीज पर लेती है, जिसके बदले सालाना भारी किराया चुकाती है। अनुमान है कि हर साल करीब 20,000 करोड़ रुपये इसी लीज से जुड़े होते हैं। इससे रेलवे को एकमुश्त बड़ा निवेश करने की जरूरत नहीं पड़ती। ट्रेनें चलाने का पूरा संचालन रेलवे के पास रहता है, लेकिन कागजों पर IRFC ही मालिक बना रहता है। रेलवे की ज्यादातर प्रीमियम ट्रेनें जैसे शताब्दी और राजधानी भी इसी पैटर्न पर चलती हैं।
इस मॉडल के फायदे
यह व्यवस्था रेल नेटवर्क के तेज विस्तार में मददगार साबित हुई है। रेलवे बिना बजट पर बोझ डाले नई ट्रेनें ला पाती है। यात्रियों को मिलने वाली सेवाओं पर भी असर कम पड़ता है। सरकार का लक्ष्य 100 से ज्यादा वंदे भारत ट्रेनें उतारना है, जो इसी फॉर्मूले से संभव हो रहा है। स्लीपर वर्जन जैसी नई वैरायटी भी इसी सिस्टम पर आ रही हैं।
चुनौतियां और भविष्य की दिशा
किराया चुकाने से टिकट दरों पर दबाव पड़ सकता है, जिस पर बहस चलती रहती है। IRFC का कर्ज बढ़ रहा है, लेकिन यह रेलवे को लचीला बनाता है। आने वाले समय में बजट से मिलने वाली अतिरिक्त फंडिंग से यह बोझ कम हो सकता है। कुल मिलाकर, यह मॉडल रेलवे को मजबूत बनाने का स्मार्ट तरीका है।
















